मंगलवार और शनिवार को जब मंदिरों में घंटियां बजती हैं, तो बड़ी संख्या में श्रद्धालु हनुमान जी के दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं। इसी दौरान कई लोग चोला चढ़ाने की परंपरा निभाते हैं, लेकिन अक्सर सही विधि की जानकारी न होने के कारण पूजा का पूरा फल नहीं मिल पाता।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चोला चढ़ाने के लिए सबसे शुभ समय ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के आसपास का होता है। यदि सुबह संभव न हो, तो शनिवार की शाम को भी यह पूजा की जा सकती है। सबसे पहले स्नान कर साफ कपड़े पहनकर मंदिर जाएं और मन को शांत रखें।
चोला चढ़ाने से पहले हनुमान जी को साफ जल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर धीरे-धीरे पूरे विग्रह पर लगाया जाता है। ध्यान रखें कि सिंदूर लगाते समय जल्दबाजी न करें और पूरी श्रद्धा के साथ यह प्रक्रिया करें। कई लोग यही गलती कर बैठते हैं कि बिना विधि जाने या जल्दी में चोला चढ़ा देते हैं, जिससे पूजा अधूरी मानी जाती है।
चोला चढ़ाने के बाद हनुमान जी को लाल वस्त्र, जनेऊ, फूल, गुड़-चना या बूंदी का भोग अर्पित किया जाता है। साथ ही दीपक जलाकर हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
पूजा के दौरान यह मंत्र बोलना विशेष फलदायी माना जाता है— “रामदूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।”
चोला चढ़ाने की यह परंपरा केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि यह शक्ति, साहस और नकारात्मकता से रक्षा का प्रतीक मानी जाती है। सही विधि और श्रद्धा के साथ की गई पूजा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास बढ़ाती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पूजा में जल्दबाजी या दिखावा न करें। सच्ची भावना, सही विधि और मन की एकाग्रता ही पूजा को सफल बनाती है।
